गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

औरत औरत हैं या फिर मात्र दिखावे का साधन बनकर रह गई हैं

आज का युग बहुत ही प्रगतिशील युग हैं. और इस दौर में हम ये मानते हैं कि जो पीछे रह गया हैं वो पिछड़ गया हैं .
लेकिन कभी कभी जब मन  इस बात को गहराई से लेता हैं कि हम अगर प्रगति पे हैं तो कहा कहा हैं तो मन कई बार उदास हो जाता हैं .
आज के दौर में ये कहा जाता हैं कि औरत ने काफी प्रगति कि हैं.
मै इस बात का समर्थन करता हूँ कि ये बात बिलकुल ठीक हैं इसमें कोई संदेह वाली बात नही है
लेकिन इस प्रगति के कारण कुछ ऐसी कमिया या कह लीजिये कि ऐसी बुराईयाँ आ गई हैं जिनका ना तो कोई और हैं और ना ही कोई छोर.
पहले औरत का आभूषण उसका चरित्र और उसका लहजा होता था.  जब सुंदर औरत अच्छी तरह से सज धज के निकलती थी तो उसके मुख कि एक झलक पाने के लिय देखने वाला परेशान रहता था. और आज का दौर ऐसा आ चूका हैं कि औरत को सिर्फ दिखावे का साधन मात्र बनाकर रख दिया हैं.


पहले ये आदमी का हाल होता था कि वो थोड़े कपडे पहनता था और कई बार  तो गाँव में ये देखने को मिलता था कि कुछ लोग तो सिर्फ अगोंच्छे और साफा ही डाले होते थे .
और औरत सर से पैर  तक ढकी हुई होती थी.
आज इसका बिलकुल उल्टा हो चूका हैं .आज आदमी जितना भी फैन्शी  और फैशन में होगा वो उतना ही कपड़ो से भरपूर होगा.
मतलब अच्छी कमीज और पेंट , कोट, टाई आदि सुवव्स्थित तरीके से होंगे.
और फैशन कि बात करे तो आँखों पे स्टाइल से लगे चश्मे आदि.
दूसरी तरफ अगर औरत कि बात करे तो आज जितनी शौक़ीन और फ़शिओनब्ले औरत होगी कपडे उसी हिसाब से कम होते जायेंगे.
कुछ कंपनी तो सिर्फ अपने प्रोडक्ट बेचने के लिये ही ऐसे विज्ञापनों का पर्योग करती हैं जिनमे औरत को ज्यादा और प्रोडक्ट को कम दिखाया जाता हैं  जैसे कि औरत तो  सिर्फ दिखावे का सामान ही हो. शर्म आनी चाहिए ऐसी कंपनियों को .
किसी कंपनी के गद्दों कि मशहूरी आती हैं तो गद्दे कम और अर्ध्नगन लडकिया ज्यादा अच्छे तरीके से  दिखाई जाती हैं 
आजकल टीवी पे किसी सीमेंट कि मशहूरी में सीमेंट का सिर्फ नाम दिखाते हैं और एक अर्ध्नगन लड़की को पानी कि और से आते दिखाते हैं .
अब सवाल ये उठता हैं कि क्या औरत सिर्फ एक मशहूरी  कि चीज़ ही बनकर  रह गई हैं ?

8 टिप्‍पणियां:

  1. Waise apne swachchh sandesh wale saleem bhaiya ye kabse cheekh pukaar rahen hai. chalo ko to mila unka sathi.

    main aapke sath nahin hoon.

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  2. ejaj ji एजाज भाई मुझे किसी और से क्यों जोड़ कर चल रहे हो ?
    मैंने तो सिर्फ उन लोगो को टार्गेट किया हैं जो इस तरह के घटिया प्रयोग करके अपनी कमाई बढ़ा रहे है लेकिन मानवीय मूल्यों को ताक पर रखकर.
    अगर इसमें कुछ ग़लत हैं और आप को गलत लग रहा हो तो मुझे बताइए.
    रहा साथ होने या ना होने का तो ये तो सबका अपना अपना नजरिया हैं भाई .
    आप इसके लिये स्वच्छंद हैं . कोई जोर नही हैं किसी पे.
    सबको अधिकार हैं किसी गलत चीज़ को गलत और ठीक चीज़ को ठीक कहने का.
    ठीक हैं ना .
    वैसे आपका धन्यवाद् इस सबके लिये

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  3. हम खुद ही नहीं समझ पा रहे है की बदलाव किस चीज का होना चहिये.
    महिला-पुरुष बराबरी के नाम पे नारी क्या खुद ही पुरुष को श्रेष्ठ नहीं घोषित कर रही है उसकी हर बात की नक़ल को ही असली आजादी मानकर . क्योंकि अनुसरण तो उसीका किया जाता है जिसको हम ऊँचा माने . अब नारी खुद ही नारीत्व को हीन माने तो पुरुष बिचारे का क्या दोष की अपने पुरुषत्व के मद में नारी को हीन समझे .क्योंकि नारी ही तो खुद इस बात का बढावा खुद दे रही है.

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  4. अमित भाई आपने तो मेरे मन की बात भी कह दी!

    कुंवर जी,

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  5. प्रदर्शन के लिए नारी जाती का अपमान जो आज हो रहा है उसके लिए सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था दोषी है जिन्होने नारी को मान के पद से हटाकर मनोरंजन की वास्तु बना दिया है.

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  6. सब कुछ तो आप ही लोग कह रहे हैं तो हम क्या कहें
    चित भी मेरी पट भी मेरी वाला हाल दिख रहा है मुझको ,इसलिए चुप रहना ही बेहतर

    अगर आपकी नजर में कोई सोरायसिस का मरीज हो तो हमारे पास भेजिए ,हम उसका फ्री ईलाज करेंगे दो महीने हमारे पास रहना होगा

    www.sahitya.merasamast.com

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  7. SANJEEV RANA ji , sadar pranaam,

    pehli baar blog padh raha hoon.

    apkaa ye lekh + AMIT BHAI ka comment padh ke kuchh kehna hi baaki nahi reh gaya . main poora samarthan kartaa hoon.

    mujhe lagta hai ki ye sari chaal videshiyon ki hai, varna Bharat desh ki naari to aaj bhi sabse uttam acharan vali hai .

    Videshi sanskriti ne dimag me aisa bhoosa bhar diya hai aaj ke modern Bhartiya ke mind me, ki vo aankhon pe patti bandth ke bas daude jaa raha hai, pata nahi jaana kahan hai ???

    agar koi patti khol ke kehta bhee hai ki

    " ye sab theek nahi ho raha hai "

    to us ke liye bhee "NARROW MINDED" jaise shabdon ka prayog karke use alag kar diya jata hai.

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